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Wednesday, November 11, 2020

Technical Analysis with Charting Basics

 टेक्निकल एनालिसिस क्या है


स्टॉक मार्केट मे जब भी निवेशक को किसी शेयर मे निवेश करना होता है तब वह उस शेयर के बारे मे अच्छे से जाणकारी प्राप्त करता है। कौनसा शेयर भविष्य मे अच्छा प्रदर्शन करेंगा यह हम technical analysis और fundamental analysis से जान सकते है। तो आज हम टेक्निकल एनालिसिस के बारे मे जानकारी लेंगे।

जिस तरह फंडामेंटल एनालिसिस में हम कंपनी की बैलेंस शीट, प्रॉफिट एंड लॉस देखते हैं; उसी तरह टेक्निकल एनालिसिस में किसी भी शेयर के चार्ट द्वारा शेयर का मूल्य ऊपर जाएगा या नीचे जाएगा इसका पता लगा सकते हैं। इसमें हम अलग-अलग कैंडल स्टिक पैटर्न, चार्ट पैटर्न, इंडिकेटर के द्वारा प्राइस एक्शन का पता लगा सकते हैं।


What is Technical Analysis?

( तकनीकी विश्लेषण क्या है?)

- टेक्निकल एनालिसिस एक ऐसा मूल्य विश्लेषण है जिसमें भूत कालीन प्राइस एक्शन द्वारा भविष्य का प्राइस ट्रेंड पता कर सकते हैं।

जिस तरह बाइक में कम पेट्रोल बाइक बंद होने का संकेत देता है, उसी तरह इंजन ऑयल का कम होना इंजन को गर्म करता है। यह एक तरह के इंडिकेटर होते है। जब हम बाइक चलाते हैं और टायर में कम हवा होगी तो बाइक हिलेगी इसका पता हमें चलता है क्योंकि भूतकाल में भी हमारे साथ ऐसा हुआ होता है। इसी प्रकार टेक्निकल एनालिसिस में भी इसी प्रकार का कार्य होता है। हिस्टॉरिकल डाटा (historical data) के आधार पर हम भविष्य के प्राइस मोमेंट का पता लगाते हैं।

मार्केट एक ट्रेंड के साथ चलता है; और जब तक बाहरी कारक उसे प्रभावित नहीं करें वह अपने पैटर्न और ट्रेंड को प्राइस के साथ दोहराता है। क्योंकि शेयरों की कीमत सप्लाई और डिमांड पर आधारित होती है।

हर बार तकनीकी विश्लेषण सही नहीं हो सकता है। किसी परिस्थिति में तकनीकी विश्लेषण का पूर्वानुमान गलत भी हो सकता है। जब मार्केट में बड़ी उथल-पुथल होती है तब तकनीकी विश्लेषण काम नहीं करता।


टेक्निकल एनालिसिस में चार्ट का महत्व

(Importance of Chart)


शेयर की कीमत में जो उतार-चढ़ाव होता है उसके द्वारा तरह-तरह की कैंडल बनती है और एक चार्ट प्रदर्शित होता है। चार्ट बनाने के कई तरीके हैं इसमें हम कैंडलेस्टिक पेटर्न (Candlestick pattern), हेकेन आशी (heikin Ashi), लाइन चार्ट (Line), बार चार्ट (bar) बनाते हैं और उनके द्वारा प्राइस के ट्रेंड का अनुमान लगाते हैं।

टेक्निकल एनालिसिस मे ज्यादातर कैंडल स्टिक पेटर्न का ही उपयोग होता है। इनके द्वारा हम अपवर्ड ट्रेंड, डाउनवर्ड ट्रेंड और साइडवेज मार्केट का अनुमान लगाते हैं। चार्ट में जो विविध पैटर्न बनते हैं उनके द्वारा कौन से प्राइस से शेयर ऊपर जाएगा और नीचे जाएगा इसका संभावित अनुमान लगा सकते हैं।


टेक्निकल एनालिसिस के टूल्स

(Technical analysis tools)


- प्राइज एक्शन (Price Action) का पता लगाने के लिए टेक्निकल एनालिसिस में ऐसे बहुत सारे टूल्स है जिस का इस्तेमाल होता है, वह निम्नवत है।

1) सपोर्ट एंड रेसिस्टेंस (Support & Resistance)

सपोर्ट और रेसिस्टेंट वह लेवल होती है जहां से किसी भी शेयर की कीमत ऊपर और नीचे जाएगी इसका अनुमान लगता है। और जब इस लेवल पर कोई कैंडलेस्टिक पैटर्न बनती है तब ट्रेंड का कन्फर्मेशन मिलता है।


A) सपोर्ट (Support)

जब मार्केट में डाउन ट्रेंड आता है तब किसी भी शेयर की प्राइस लगातार नीचे नीचे गिरती है और एक ऐसे लेवल तक आकर रुक जाती है और वहां पर एक रेंज बनाती है। उसे ही हम सपोर्ट कहते हैं। यह जो सपोर्ट की रेंज होती है वह भूतकाल में भी बनी होती है।


B) रेसिस्टेंस (Resistence)

मार्केट में जब तेजी का दौर होता है तब शेयर की प्राइस लगातार बढ़ती जाती है और एक ऐसे लेवल तक जाकर रुक जाती है जिसे तोड़ पाना लगभग नामुमकिन होता है। उसे ही हम रेसिस्टेंट कहते हैं।


2) कैंडल स्टिक पैटर्न 

कई तरह के कैंडल स्टिक पैटर्न होते हैं। इसमें कुछ कैंडल तेजी का संकेत देते हैं। जैसे ड्रैगनफ्लाई डोजी (Dragonfly doji), हैमर (hammer), बुलिश हरामि (bullish harami), बुलिश मरूबोझू (marubozu)!

उसी तरह कुछ कैंडल मंदी का या डाउन ट्रेन का संकेत देते हैं! - जैसे हैंगिंग मैन (hanging man), ग्रेवस्टोन दोजी (gravestone doji), बेयरिश मरूबोझू bearish marubozu)!


3) चार्ट पैटर्न (Chart Pattern)

टेक्निकल एनालिसिस में कई तरह के चार्ट पैटर्न द्वारा मार्केट ट्रेंड का पता लगाते हैं।

- इसमें बीयरीश फ्लैग और बुलिश फ्लैग द्वारा प्राइस ऊपर जाएगा या नीचे जाएगा यह ब्रेकआउट और ब्रेकडाउन के बाद कन्फर्म होता है।

- उसी तरह चार्ट में एक कप विद हैंडल पैटर्न बनता है जब इसका ब्रेकआउट होता है तब बुलिश सिग्नल मिलता है।

चार्ट में डबल टॉप, डबल बॉटम, बुलिश और बेयरिश चैनल ऐसे पैटर्न के द्वारा हम किसी भी शेयर की प्राइस ऊपर जाएगी या नीचे जाएगी इसका अंदाजा लगाते हैं।


4) इंडिकेटर्स (Indicators)

टेक्निकल एनालिसिस में बहुत सारे लोग अलग-अलग तरह के इंडिकेटर्स का उपयोग करते हैं। कुछ तो कस्टम इंडिकेटर भी बनाते हैं। यह जो इंडिकेटर्स होते हैं वह प्राइस के साथ चलते हैं।


A) वॉल्यूम Volume

- इसमें हम कौनसे प्राइस पर शेयर में खरीदारी और बिकवाली हो रही है इसका पता लगाते हैं। वॉल्यूम एक ऐसा इंडिकेटर है जो ट्रेंड का कन्फर्मेशन देता है। क्योंकि मार्केट डिमांड और सप्लाई पर ही चलता है, और डिमांड और सप्लाई वॉल्यूम पर ही पता चलती है।


B) मूविंग एवरेज (Moving Average)

इसमें हम कोई स्टॉक 5 दिन में, 1 महीने, 100 दिन, 200 दिन में कैसे चल रहा इसका पता लगाते हैं। जब स्टॉक 200 दिन के मूविंग एवरेज के ऊपर होता है तो वह बुलिश सिग्नल देता है।

उसी तरह मूविंग एवरेज के क्रॉसओवर से तेजी और मंदी का संकेत मिलता है।

C) इसी तरह RSI, MACD, VWAP, Stochastic ऐसे कई सारे इंडिकेटर होते हैं।


आगे हम इन सब को विस्तार से पढ़ेंगे टेक्निकल एनालिसिस में इन सब का बहुत महत्व है; और यह पैटर्न सालों से चलते आ रहे हैं इसलिए इसकी अचूकता भी है!






Tuesday, November 10, 2020

What is Fundamental Analysis

 फंडामेंटल एनालिसिस क्या है?


 स्टॉक मार्केट मे जब भी निवेशक को किसी शेयर मे निवेश करना होता है तब वह उस शेयर के बारे मे अच्छे से जाणकारी प्राप्त करता है। कौनसा शेयर भविष्य मे अच्छा प्रदर्शन करेंगा यह हम technical analysis और fundamental analysis से जान सकते है। तो आज हम कंपनी के फंडामेंटल के बारे मे जानकारी लेंगे।

मार्केट मे दो प्रकार के निवेशक होते है। - 

1) ट्रेडर्स

2) Investors

इन्व्हेस्टर्स का निवेश का नजरिया दीर्घकालीन होता है उस वजह से उन्हे किसी भी कंपनी मे निवेश के लिये कंपनी के फंडामेंटल के बारे मे जाणना जरुरी होता है।

What is Fundamental Analysis?- 

(फंडामेंटल एनालिसिस क्या है?) -

-- किसी कंपनी का बिझनेस, प्रॉडक्ट और उसकी मांग, लाभ, बॅलन्स शीट इन सब का विश्लेषण करके जब हम किसी शेयर मे निवेश करते है उस प्रक्रिया को फंडामेंटल एनालिसिस कहते है।

निवेशक जब भी किसी शेयर मे एक साल से ज्यादा के समय के लिये निवेश करेगा तब देखता है की उस कंपनी की आर्थिक स्थिती कैसी है, भविष्य मे कंपनी कितनी आय अर्जित करेगी, मुनाफा क्या होगा। इन सब के लिये फंडामेंटल एनालिसिस मे अलग अलग पैलू है जिनके द्वारा हम अच्छे फंडामेंटल वाली कंपनी का चयन कर सकते है।


- Key points of fundamental analysis

( फंडामेंटल एनालिसिस के मुख्य बिंदु) 


बैलेंस शीट (Balance sheet)

हम किसी भी कंपनी के आर्थिक स्थिति की जांच बैलेंस शीट के द्वारा करते हैं। बैलेंस शीट में देयता (Liabilities) और संपत्ति(Assets) ऐसे 2 भाग होते हैं।

 देयता में कंपनी के शेयर कैपिटल, कंपनी ने लिए हुए लोन, रिजर्व तथा करंट लायबिलिटी होती है। तो संपत्ति के साइड में फिक्स्ड असेट्स, करंट असेट्स होते हैं। इस प्रकार बैलेंस शीट से जानकारी मिलती है।


प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट (P & L Account) 

 इससे हमें किसी भी कंपनी के आय और व्यय के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इसमें हम कंपनी का व्यय कितना है, उसके बाद ग्रॉस प्रॉफिट और नेट प्रॉफिट क्या है इस बारे में जान सकते हैं।


कैश फ्लो स्टेटमेंट (Cash Flow Statement)

 इस स्टेटमेंट से हमें यह पता चलता है कि कंपनी के पास पैसा कहां से आ रहा है और पैसा कहां खर्च हो रहा है। इसमें ऑपरेटिंग एक्टिविटी, इन्वेस्टिंग एक्टिविटी और फाइनेंशियल एक्टिविटी ऐसे 3 भाग होते हैं।


वित्तीय अनुपात (Ratio) 

प्रति शेयर अर्निंग रेशियो (EPS) 

इससे हमें कंपनी को प्राप्त नेट प्रॉफिट में कंपनी द्वारा जारी किए गए कुल शेयरों में प्रति शेयर आय कितनी है यह पता चलता है।


बुक वैल्यू(Book Value) 

इसमें हमें कंपनी के खाते में शेयर की कीमत क्या है यह पता चलता है।


प्राइस अर्निंग रेशों (P/E Ratio)

कंपनी के शेयर का बाजार मूल्य तथा कंपनी की प्रति शेयर आय के अनुपात को प्राइस अर्निंग रेशों कहते हैं।


रिटर्न रेशों (Return on Equity Ratio)

 कंपनी के शेयरधारकों का पैसा बिजनेस में लगाकर कंपनी कितना लाभ अर्जित करती है इससे हम इक्विटी पर कितना रिटर्न मिलेगा यह देखते हैं।


डेब्ट इक्विटी रेशों (Debt Equity Ratio)

किसी कंपनी के लंबी अवधि के ऋण तथा कंपनी का इक्विटी कैपिटल इसके द्वारा हम इस रेशों को निकालते हैं। उच्च डेब्ट रेशों किसी भी कंपनी के लिए अच्छा नहीं होता है, क्योंकि इससे कंपनी की ऋण चुकता करने की क्षमता का पता चलता है।


लंबी अवधि के निवेश के लिए फंडामेंटल एनालिसिस क्यों महत्वपूर्ण है

किसी भी कंपनी की वैल्यू उसके फंडामेंटल पर ही आधारित होती है। कंपनी क्या बिजनेस करती है, कंपनी का नेट प्रॉफिट क्या है, इसके आधार पर कंपनी की ग्रोथ दिखती है। म्यूचल फंड, संस्थागत निवेशक किसी भी कंपनी में निवेश करने के लिए उसकी फंडामेंटल जांच करते हैं।

 किसी भी कंपनी के फंडामेंटल एनालिसिस द्वारा हमें उस कंपनी के प्रॉफिट और लॉस के बारे में पता चलता है। उस कंपनी पर कितना कर्ज है और कर्ज चुकाने के लिए किस तरह की संपत्ति है इसका पता चलता है। पी/इ रेशियो, बुक वैल्यू और प्रति शेयर आय द्वारा कंपनी के वैल्यू पता चलती है। 

किसी भी कंपनी के शेयर के प्राइस पर नकारात्मक न्यूज़ का प्रभाव पड़ता है, लेकिन वह अल्पावधि के लिए ही होता है। लेकिन लंबे समय में कंपनी के परफॉर्मेंस पर उसकी वैल्यू और ग्रोथ निर्धारित होती है इसीलिए फंडामेंटल एनालिसिस महत्वपूर्ण है।


स तरह फंडामेंटल एनालिसिस में हम किसी भी कंपनी की बैलेंस शीट द्वारा कंपनी की संपत्ति, देनदारी, उसके ऊपर का कर्ज का पता कर सकते हैं। तथा कंपनी की कुल बिक्री कितनी है, प्रति शेयर आय कितनी है, कंपनी का लाभ और हानि कितनी है, इन सब की जानकारी प्राप्त होती है। और इन सब के द्वारा हम जो अच्छी आय प्राप्त करने वाली कंपनी है, जो रेगुलर डिविडेंड देती है, इन जैसे वैल्यू इन्वेस्टिंग तथा ग्रोथ इन्वेस्टिंग कंपनी में पैसा लगाकर दीर्घ अवधि का नजरिया रख सकते हैं।









Monday, November 9, 2020

Delivery Trading- Meaning, Benifits & Charges

 डिलीवरी ट्रेडिंग क्या है?


शेयर मार्केट मे बहुत से निवेशक जुड रहे है। और जो नये निवेशक होते है उन्हे शेयर कैसे खरीदी और बिक्री करते है उसकी कम जानकारी होती है। तो आज हम डिलिव्हरी ट्रेडिंग (delivery trading) क्या होती है यह जानेंगे।

शेयर मार्केट मे दो प्रकार के लोग होते है,

एक जो जिस दिन शेयर की खरीदी होती है उसी दिन बेच दिया जाता है उसे हम इंट्राडे ट्रेडिंग कहते है। और जो लोग यह क्रिया करते है उन्हे मार्केट की भाषा मे ट्रेडर्स कहते है।

दुसरा किसी भी शेयर को आज खरीदी करके भविष्य मे कभी भी बेच सकते है। इस प्रकार की क्रिया जो करते है उन्हे इन्व्हेस्टर्स (निवेशक) कहते है!


डिलीवरी ट्रेडिंग क्या है?

(What is Delivery Trading)

- जब हम किसी शेयर को आज खरीद कर उसे 1 दिन से ज्यादा समय के लिए रखते हैं, तो उस शेयर की खरीद को हम डिलीवरी ट्रेडिंग कहते हैं।

जब हम किसी भी शेयर को खरीदते हैं तब वह दिन और उसके बाद के 2 दिन (T+2days) के बाद शेयर हमारे डीमैट अकाउंट में आ जाता है। एक बार डीमेट में शेयर आ गया तब हम उसे जब चाहे तब बेच सकते हैं।


डिलीवरी ट्रेडिंग के दो प्रकार

1) शॉर्ट टर्म :-

जब हम किसी शेयर को आज खरीद कर उसे पांच-छह महीने बाद बेच देते हैं, उसे अल्पकालीन या शार्ट टर्म डिलीवरी कहते हैं।

2) लॉन्ग टर्म :- 

जब किसी शेयर को हम 6 महीने से 1 साल से ज्यादा रखते हैं उसे हम दीर्घकालीन या लॉन्ग टर्म डिलीवरी ट्रेडिंग कहते हैं।


इंट्राडे ट्रेडिंग और डिलीवरी ट्रेडिंग में अंतर

- (1) इंट्राडे ट्रेडिंग में शेयर को जिस दिन खरीदा उसी दिन बेच सकते हैं। तो डिलीवरी ट्रेडिंग में आज खरीद कर कभी भी बेच सकते हैं। ऐसा जरूरी नहीं आज ही बेचना है।


(2) इंट्राडे ट्रेडिंग में ब्रोकर हमें मार्जिन देता है। कम पैसे में हम ज्यादा शेयर खरीद सकते हैं। लेकिन डिलीवरी ट्रेडिंग में जितने मूल्य का शेयर खरीदना है उतना पैसा हमें ब्रोकर को देना होगा।


(3) इंट्राडे ट्रेडिंग में उच्च जोखिम उच्च मुनाफा होता है। तो डिलीवरी ट्रेडिंग में जोखिम कम है और मुनाफा भी कम है। क्योंकि हमारे पास लगाने के लिए पैसा भी कम है।


(4) इंट्राडे ट्रेडिंग में हम जो खरीदी बिक्री करते हैं वह प्रॉफिट और लॉस तक ही सीमित है। लेकिन डिलीवरी ट्रेडिंग में हम जो शेयर खरीदते हैं उस पर हमें डिविडेंड मिलता है। हो सकता है बोनस भी मिल जाए।


शेयर खरीद में डिलीवरी ट्रेडिंग के शुल्क

1) brokerage ( कोई ब्रोकर फ्री डिलीवरी ट्रेडिंग देता है)

2) Security transiction charge ( जब हम सेल करेंगे तब लगेगा, खरीदारी के वक्त नहीं लगता)

3) GST 18% brokerage पर

4) Exchange transiction charge

5) Sebi turnover fees

6) Stamp duty

इन प्रकार के चार्जेस डिलीवरी ट्रेडिंग में लगते हैं। जो शेयर हमारे डिमैट अकाउंट में होता है जब हम उसे बेचते हैं तब डीपी हैंडलिंग चार्जेस ₹20 से ₹23 के बीच देना पड़ता है।


डिलीवरी ट्रेडिंग के फायदे

(1) आज शेयर खरीदी करो और कभी भी बेचो यानी जब मुनाफा होगा तब बेचेंगे।

(2) हमारे पास जो शेयर होते हैं उस पर हमें बोनस और डिविडेंड भी मिलेगा।

(3) इसमें हम जोखिम को कम कर सकते हैं। और दीर्घावधि में अच्छा मुनाफा हासिल कर सकते हैं।

(4) नया निवेशक भी एक-दो शेयर खरीदकर निवेश की शुरुआत कर सकता है।

(5) कुछ बैंक शेयर पर ऋण सुविधा भी देते हैं।


निष्कर्ष

इंट्राडे ट्रेडिंग और डिलीवरी ट्रेडिंग दोनों के अपने-अपने फायदे हैं और अपने अपने नुकसान है। डिलीवरी ट्रेडिंग में शेयर खरीदने के लिए हमें किसी भी कंपनी के फंडामेंटल के बारे में जानना जरूरी होगा। किसी शेयर को कम दाम पर खरीद कर उसे कुछ समय रखकर हम बैंक से ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।

अंततः कोई भी निवेश जोखिम भरा होता है, इसीलिए सोच समझकर निवेश करना चाहिए।












Sunday, November 8, 2020

What is Intraday Trading & How to Trade

 इंट्राडे ट्रेडिंग क्या है


शेयर मार्केट मे जब भी कोई नया निवेशक जुडता है तो उसे भी जल्द से जल्द अपने पैसो को double करने की, बहुत मुनाफा कमाने की चाह होती है। उस वक्त intraday या डे ट्रेडिंग यह शब्द उसके कानो पर आता है। बाजार निवेशक को एक दिन मे बडा मुनाफा कमाने का और एक दिन मे पुरा पैसा डूबाने का मौका देता है। ऐसे ही एक दिन के मार्केट के बारे मे आज हम जानेंगे।


इंट्राडे क्या है !

किसी शेयर को उसके दैनिक उतार-चढ़ाव के बीच खरीद कर उसी दिन बेचना यानी इंट्राडे (Intraday) या डे ट्रेडिंग कहते हैं!

इस मे हम जिस दिन शेयर को buy करेंगे उसी दिन profit या loss बूक करके बेचना पडेगा। नही तो ब्रोकर हमारा सौदा जब मार्केट बंद होगा ऊसके पहले कट कर देगा।

भारतीय शेयर बाजार 9:00 AM को pre-open होता है।  9:15 AM को सभी ट्रेडर्स के  लिये खुला हो जाता है। उस वक्त से 3:15 pm - 3:30 pm तक हम इंट्राडे ट्रेडिंग कर सकते है। ज्यादातर ब्रोकर इंट्राडे पोसिशन 3:15 PM के बाद square off करते है।


शेयर की खरिदारी के ऑर्डर के लिये हमारे पास तीन विकल्प होते है।

1) intraday

2) dilevery

3) Margin

जब भी हम इंट्राडे मे सौदा लेगे तब हम इंट्राडे ऑर्डर लगायेगे।


- आज नए निवेशक जल्दबाजी में पैसा कमाने के चक्कर में इंट्राडे ट्रेडिंग (Intraday Trading) करते हैं और उसमें उन्हें बड़ी मात्रा में नुकसान होता है!

किसी भी शेयर की जानकारी ना होते हुए शेयर ऊपर जाएगा या नीचे यह अनुमान लगाकर वह ट्रेडिंग करते हैं और हानि हो जाती है;

तो देखिए आपको इंट्राडे में वह भी कम जोखिम पर अधिक मुनाफा कमाना है तो आपको मार्केट के बारे में अच्छा ज्ञान होना चाहिये! लोगों को इंट्राडे में सफलता हासिल करने के लिए सालों लग जाते हैं; आपको भी ऐसी सफलता हासिल करनी होगी तो टेक्निकल एनालिसिस के बारे में आप अच्छे से शिक्षा प्राप्त करें! और उस पर प्रैक्टिस ट्रेडिंग कीजिए कुछ 5–10 शेयर चुनिए और उसके दैनिक हलचल को ट्रैक कीजिए!


क्यू ज्यादातर निवेशक इंट्राडे मे ट्रेडिंग करना चाहते है।

- ट्रेडर्स को जल्द से जल्द पैसे कमाने की चाहत।

- कम पैसे में ट्रेडिंग कर सकते हैं! इंट्राडे ट्रेडिंग में ब्रोकर ट्रेडर को मार्जिन देता है, जिस वजह से हम कम पैसे में भी ट्रेड ले सकते हैं!

-एक ही दिन में खरीदी और बिक्री होने की वजह से हम कभी भी मुनाफा बुक करके पोजीशन कट कर सकते हैं बाद में मार्केट को ट्रैक करने की जरूरत नहीं


इंट्राडे ट्रेडिंग करने से पहले इन बातों का ध्यान रखें

1) सबसे पहले हमें ट्रेड के लिए 2-3 स्टॉक ऐसे सिलेक्ट करना चाहिए जिसमें अच्छी लिक्विडिटी हो।

2) ट्रेडिंग के लिए अपनी एक स्ट्रेटजी बनाए, जैसे प्राइस एक्शन, प्राइस ब्रेकआउट, पेटर्न्स ब्रेकआउट,

3) स्टॉप लॉस और ट्रेलिंग स्टॉप लॉस का उपयोग कीजिए। लॉस करने से बेहतर छोटा-छोटा मुनाफा बुक करते जाए।

4) ब्रोकर के मार्जिन का ज्यादा इस्तेमाल करके ओवरट्रेडिंग ना करें। 1-2 ट्रेड में प्रॉफिट एंड लॉस बुक हो गया होगा तो उस दिन के लिए ट्रेड बंद करें, फिर अगले दिन देखेंगे।

5) मार्केट ट्रेंड के साथ चलिए मार्केट बुलिश होगा तो खरीददारी की सोचे।

6) इंट्राडे में समय को भी महत्व है। 

आप देखते होंगे जब मार्केट 9:15 को ओपन होता है उस वक्त से लगभग 11:00 तक अच्छा मोमेंट रहता है, बाद में मार्केट साइडवेज होता है। फिर 2:00 बजे के बाद बायर और सेलर्स पुन एक्टिव हो जाते हैं।


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Monday, November 2, 2020

Why Share Prices Move Up & Down

क्यो होते है Share Price उपर नीचे? 

हम हर दिन शेयर बाजार में देखते हैं कि रोजाना शेयर की कीमतों में उतार चढ़ाव होता है। ऐसे कई कारण होते हैं जो मार्केट में हर एक शेयर की कीमतों को प्रभावित करते हैं। बाजार की दैनिक मांग और आपूर्ति तथा किसी भी शेयर से संबंधित न्यूज़, इन जैसे कारक मुख्यता कारणीभूत होते हैं। कुछ ऐसे कारक होते है जो supply और demand को प्रभावित करते है, उस वजह से price मे तेजी या मंदी दीखती है।

तो आज हम इन सब की विश्लेषणात्मक जानकारी हासिल करेंगे

Read :- What is Share market


"शेयर की कीमतों में उतार चढ़ाव को प्रभावित करने वाले कारक"

मांग और आपूर्ति (Demand & Supply):-

शेयर को खरीदने के लिये कितने निवेशक रुची दिखाते है उसपर शेयर की मांग निर्धारित होती है। और मांग ज्यादा रही तो किंमत मे भी चढाव देखने को मिलेंगा। किसी शेयर के खरीदारी के प्रति निवेशक का रुझान अच्छा नहीं होगा तो शेयर की कीमत धीरे-धीरे नीचे चले जाएगी, क्योंकि शेयर को बेचने वाले निवेशक ज्यादा हो गए और खरीदार नहीं के बराबर।

1 दिन में एक शेयर में हजारों, लाखों खरीददार और बेचने वाले उपलब्ध होते हैं।

उदाहरण :- हमने अपने दैनंदिन जीवन में भी देखा होगा जब हम मार्केट में जाते हैं तब किसी वस्तु की मात्रा कम हो और मांग ज्यादा हो तो उसकी कीमत बढ़ जाएगी, उससे ही उल्टा वस्तु बड़ी मात्रा में उपलब्ध होगा तो उसकी कीमत कम हो जाएगी।

शेयर बाजार में भी मांग और आपूर्ति पर शेयर की कीमत का निर्धारण होता है। मांग और आपूर्ति को प्रभावित करने वाले अलग-अलग घटक होते हैं और वह भी शेयर के मूल्य को निर्धारित करते हैं।

>> तो अब हम देखेंगे शेयर की मांग और आपूर्ति को निर्धारित करने वाले ऐसे कौन से घटक है।

2) ✓ :- जब संस्थागत निवेशक, विदेशी निवेशक, mutual fund किसी शेयर मे निवेश करते है तब market sentiments उस stock के प्रती सकारात्मक होता है।


3) ✓ :- शेयर buyback, dividend, bonus, spilt के वजह से भी शेयर के मूल्य मे उतार-चढाव दिखता है।


4) ✓ :- जब कोई ब्रोकरेज कंपनी या एनालिस्ट, रेटिंग एजेंसी किसी कंपनी को upgrade या downgrade करती है तब भी शेयर के मूल्य मे उतार चढाव दीखता है।


"कंपनी के फंडामेंटल"


लंबी अवधि में किसी भी शेयर के मूल्य में वृद्धि उसके अच्छे फंडामेंटल के कारण होती है। जिस कंपनी का अर्निंग रेट (Earning Rate) अच्छा हो, त्रैमासिक, वार्षिक कंपनी अच्छा मुनाफा कमा रही हो, और प्रति शेयर अर्निंग भी अच्छी है, वह कंपनी के शेयर में वृद्धि देखने को मिलती है।

उससे ही विपरीत कोई कंपनी हर साल (Loss) हानी दिखाती है, उसके फंडामेंटल अच्छे नहीं है, वह कंपनी के मांग में कमतरता आएगी और कंपनी की वैल्यू दिन-ब-दिन कम हो जाएगी।

कंपनी की मार्केट में स्थिति कैसी है, उनके प्रोडक्ट की बाजार में कितनी मांग है, उस पर भी मूल्य निर्धारित होता है। तथा मैनेजमेंट कैसा है यह भी जरूरी होता है।


"टेक्निकल एनालिसिस"

जिस तरह से लंबी अवधि में हम कंपनी के फंडामेंटल से उसके स्थिति के बारे में पता कर सकते हैं, उसी तरह शॉर्ट टर्म में हम तकनीकी दृष्टि से शेयर के मूल्य में वृद्धि होगी या गिरावट होगी यह जान सकते हैं। इसमें हम शेयर ने भूतकाल में कैसा परफॉर्मेंस किया, कौन से प्राइस से शेयर की कीमत में बड़ी मात्रा में उतार और चढ़ाव दिखा, उसके चार्ट, पेटर्न, वॉल्यूम इनसे  अल्पकाल की मांग और आपूर्ति निर्धारित होती है।

पास्ट परफॉर्मेंस के प्राइस एक्शन के अनुसार हम आने वाले दिनों में शेयर कैसे चाल चलेगा यह हम जान सकते हैं।

शेयर के कौन सी कीमत पर बड़ी मात्रा में डिलीवरी हो रही है उससे हम वृद्धि का अंदाजा लगा सकते हैं।

और इसमें ही बहुत सारे टेक्निकल इंडिकेटर भी होते हैं जो हमें भविष्य के शेयर की कीमत का निर्धारण करने में मदद करते हैं। जैसे मूविंग एवरेज (Moving Average), (RSI) आरएसआई, (MACD) एमएसीडी!


"मार्केट सेंटीमेंट्स"

इसमें ट्रेडर और निवेशक किसी शेयर के प्रति खरीददारी और बेचने के लिए कितना तत्पर है, तथा एखाद शेयर की कीमत बहुत मात्रा में गिर गई है तो निवेशक बेचेगा या और खरीदारी करेगा इस पर भी मार्केट सेंटीमेंट्स निर्धारित होते हैं। और उससे उस शेयर की कीमत में उतार और चढ़ाव आता है।



"सरकारी नीतियां और वैश्विक कारक"

सरकार समय-समय पर औद्योगिक नीतियां लाते है। सरकार की कर निर्धारण नीति, बाजार के प्रति सरकार की नीति, इन जैसे कारक भी अल्पकाल में शेयर की कीमत का निर्धारण करते हैं।

स्थिर सरकार बाजार के लिए अनुकूल होती है। रिजर्व बैंक की पॉलिसी इन जैसे कारक भी प्रभावित करते हैं।


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Thursday, October 29, 2020

What is Share Buyback

 शेयर बायबैक (Buyback) के पीछे कंपनी का उद्देश्य


आप स्टॉक मार्केट मे निवेश करते होगे तो आपने भी सुना होगा की कोई ना कोई कंपनी अपने शेयर बायबैक कर रही है, तो आप भी सोच रहे होगे की बायबैक होता क्या है?, कंपनी क्यू बायबैक करती है। तो आज हम देखते है आपके सवालो के जवाब।

हम देखते है की, शेयर बाजार के हर एक कंपनी मे बहुत सारे निवेशक होते है। जैसे प्रमोटर्स, घरेलू संस्थागत निवेशक, विदेशी निवेशक, म्युच्युअल फंड तथा आम निवेशक। इन सब मे कंपनी के भाग (share) विभाजित होते है। इसे ही हम भागधारक (share holder) कहते है।

यह पढे:- Secret of success in stock market


तो देखते है शेयर buyback होता क्या है?

शाब्दिक अर्थ देखे तो ऐसा प्रतीत होता है की, कंपनी अपने ही शेयर का कुछ अनुपात पुनः खरीदनेके लिये इच्छूक है। यानी जब कंपनी अपने शेयर अपने ही निवेशकों से पुनः खरीदी करती है उसे हम बाय बैक कहते हैं। किसी कंपनी के पास कॅश रिसर्व ज्यादा, अतिरिक्त है तो कंपनी अपने भागधारक को कह सकते है की हम शेयर बायबैक कर रहे है, इसके लिये ज्यादातर कंपनी एक निश्चित शेयर का मूल्य तय करती है। वो मूल्य वर्तमान मूल्य से लगभग ज्यादा ही रहता है; उस मूल्य पर जिन्ह निवेशक को शेयर बेचना है वह बेच सकता है, इस एक स्थिती मे कंपनी शेयर खरीद लेगी।

दुसरा जब भी कंपनी को बायबैक करना है, तब वह बाजार किंमत पर खरीद सकता है। कंपनी के जो शेयर होते है वह या तो कंपनी खरीदती है या उनके प्रबंधक, प्रवर्तक खरीदते हैं 

"बायबैक की प्रक्रिया"


जब भी किसी कंपनी को अपने शेयर खरीदने का प्रस्ताव लाना होता है तो उस प्रस्ताव को कंपनी के बोर्ड के सामने रखना पड़ता है। बोर्ड के मंजूरी के बाद कंपनी बाय बैक की योजना तैयार करती है। एक निश्चित राशि और तिथि में बायबैक का कार्यक्रम निश्चित होता है। जिन निवेशकों के पास उस स्थिति तक शेयर होते हैं वह बायबैक में आवेदन कर सकते हैं।


"टाटा कंसल्टेंसी शेयर बायबैक"

टीसीएस ने अपने बोर्ड मीटिंग दिनांक 7 अक्टूबर 2020 को 16000 करोड़ रुपए का बायबैक घोषित किया है।

TCS प्रति शेयर ₹3000 के भाव पर 53 करोड़ शेयर की खरीदारी कर रहा है

Offer details

Offer size:- 16000 crore₹

Offer price:- 3000₹/share

CMP:- 2673₹/Share

Premium:- 327₹/share

TCS मे वर्तमान निवेशक बायबैक के लिये आवेदन कर प्रति शेयर 327₹ मुनाफा अर्जित कर सकते है।


"शेयर बायबैक के पीछे कंपनी का उद्देश्य" 

सकारात्मक:- 

जब किसी नकारात्मक खबरों के कारण तथा वैश्विक मंदी के समय में किसी कंपनी के शेयर के प्राइस में बहुत उतार आता है, तब वह शेयर का प्राइस अंडरवैल्यूड होता है। लेकिन कंपनी के फंडामेंटल अच्छे रहते हैं उस वजह से कंपनी बाय बैक लाता है।


नकारात्मक पहलू

 हो सकता है कंपनी के पास कैश रिजर्व ज्यादा हो और कंपनी के पास वर्तमान में इन्वेस्टमेंट के लिए कोई मार्ग उपलब्ध नहीं, उस स्तिथी में भी कंपनी बाय बैक ला सकती है।


"शेयर पर बाय बैक का असर" 

जिस दिन कंपनी बायबैक घोषित करती है तब शेयर में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। बायबैक की वजह से कंपनी के प्रति शेयर आय में वृद्धि होती है क्योंकि ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध शेयर की संख्या में कमी आती है।

इस प्रकार कंपनी अपने शेयर पुनः खरीदने के लिये बायबैक लाती है। और निवेशक बायबैक मे अपने शेयर बेचकर मुनाफा अर्जित कर सकता है।

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Friday, October 23, 2020

National Pension Scheme (NPS)

 " राष्ट्रीय पेंशन योजना "



सरकार अपने नागरिकों के लिए नई-नई बचत योजना, निवेश योजना लाती है, जिससे नागरिकों को लाभ हो और भविष्य में आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो। उसमे ही एक योजना National Pension System अर्थात राष्ट्रीय पेन्शन योजना भारत सरकार द्वारा स्थापित एक पेन्शन योजना है। जो मासिक बचत द्वारा लोगो को सेवानिवृत्ती के बाद वृध्दावस्था मे पेन्शन द्वारा सुरक्षा प्रदान करती है।

1 जनवरी 2004 के पहले सरकारी कर्मचारी को सरकार खुदसे पेन्शन देती थी। लेकीन 1 जनवरी 2004 के बाद सरकार ने पुराणी पेन्शन योजना बंद करके राष्ट्रीय पेन्शन योजना लाई। और सभी सरकारी कर्मचारीयोको यह बंधनकारक कर दी। ओर 2009 के बाद इस योजना को प्राइवेट सेक्टर के लिए भी खुला कर दिया गया।

 राष्ट्रीय पेंशन योजना को पीएफआरडीए रेग्युलेट करता है।

एनपीएस कौन ले सकता है।

- कोई भी भारतीय नागरिक जिसकी उम्र 18 से 65 साल के बीच हो वह एनपीएस में अपना खाता चालू करा सकता है। इसमें अनिवासी भारतीय भी खाता चालू कर सकता है।

"एनपीएस लाने का उद्देश"


केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय पेंशन योजना मुख्यता सरकारी कर्मचारियों की पेंशन की देयता दूर करने के लिये लायी गयी है। और सभी सरकारी, गैर सरकारी कर्मचारी तथा लोगो को पेन्शन और निवेश का विकल्प एक साथ उपलब्ध करणे के लिये इसे चालू कराया गया है। इस योजना द्वारा अभी सरकार की देयता सीमित हो गयी है।

1 जनवरी 2014 के बाद सभी केंद्रीय कर्मचारी वर्ग (सशस्त्र बल के अलावा) के लिये अनिवार्य कर दिया है।

इस योजना मे केन्द्र सरकार कर्मचारी वर्ग के पेन्शन हेतू मासिक अंशदान करती है। मुल वेतन+ महंगाई भत्ते के 10% सरकार NPS मे जमा करती है। अभी वर्तमान मे सरकार का अंशदान 14% है।


राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय पेन्शन योजना लागू करना।

- वर्तमान मे कुछ राज्यो ने राष्ट्रीय पेन्शन योजना (NPS) को अपनाया है तो कुछ ने नही। आज भी कुछ राज्य पुरानी पेन्शन दे रहे है।


"राष्ट्रीय पेंशन योजना कैसे कार्य करती है"

एनपीएस का एक ट्रस्ट है, उसे पीएफआरडीए रेग्युलेट करता है। राष्ट्रीय पेन्शन योजना मे एक व्यक्ती एक ही खाता खोल सकता है। इसमे दो प्रकार के अकाउंट है। एक टायर- 1 और दुसरा टायर-2

Tier-1 अकाउंट मुख्यता पेन्शन के लिये है। Tier-2 अकाउंट इन्व्हेस्टमेंट के लिये है। 

जो एनपीएस धारक होते हैं उनके पैसों को पेंशन फंड मैनेजर निवेश करते हैं। सरकारी कर्मचारियों का जो पैसा होता है वह एसबीआई, यूटीआई और एलआईसी में इन्वेस्ट किया जाता है।

जो व्यक्ति राज्य या केंद्र सरकार का कर्मचारी नहीं है वह व्यक्ति भी इसमें अकाउंट खोल सकता है। मात्र ₹500 से हम वह चालू कर सकते हैं। और साल का कम से कम ₹1000 जमा करना होगा।

जिस व्यक्ति के पास टायर वन अकाउंट होता है वहीं इस टायर 2 अकाउंट को चालू करा सकता है। इसमें व्यक्ति कभी भी पैसा डाल सकता है निकाल सकता है, लेकिन इस पर कर छूट नहीं मिलती। आप इसमें ₹1000 के साथ अकाउंट खोल सकते हैं और हर एक अंशदान 250 रुपए का होना चाहिए।

कोई भी सरकारी कर्मचारी जो tier -I मे निवेश करता है वह खुद के निवेश की 25℅ राशी पुरे टर्म मे 3 बार कभी भी निकाल सकता है। जब 60 साल बाद कार्यकाल समाप्त होता है तब 60% राशी हमे मिलती है। और बाकी 40% राशी पेन्शन फंड मे हस्तांतरित होती है।


"कर लाभ"

एनपीएस मे किया गया निवेश आयकर अधिनियम के अंतर्गत 80C द्वारा 1.50 लाख ₹ टॅक्स छुट देता है। और अधिनियम के 80CCD (1B) के अनुसार 50000₹ अतिरिक्त कर लाभ होता है।

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